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प्रेम

August 20, 2025

सुना है प्रेम पहाड़ों पे पनपता है
इन पत्थरों में भी कोई सपना जन्मता है।

शायद इनकी तन्हाई से उठती हो आहें !
और बिन चाहे आ जाती हों बाँहों में बाहें।

पर, इन पत्थर दिल पत्थरों ने कितनों का दिल तोड़ा होगा
जब यहाँ सपनों ने सच्चाई से रिश्ता जोड़ा होगा।

और तब सच्चे प्रेमी की सच्ची बाँहों को
मन में उमड़ते अनंत भावों को।

इसने सत्य दुग्ध झरना सा बना दिया
हृदय में धड़कती धड़कन सा बहा दिया।

झरना, धड़कन की तरह कभी धीमा कभी तेज़ चला है
अन्तर्मन की उलझन सा उमड़ा - घुमड़ा और गहरी खाई से जा मिला है।

और जब गहरी खाई से धुआँ उठा
तो लगा विचारों में गहरा गुँथा।

कोई भाव फिर प्रकृति पर कर रहा क्रोध
तुम हम पर ही क्यों करती हो शोधा।

प्रेम अपराध है?
अगर है! तो यह हमारी शरीर नहीं
आत्मा का श्राद हैं।

अरे पत्थरों बोलो तुमने क्या- क्या देखा
प्रस्तुत कर दो आज अपने अंतर्मन का लेखा।

ताकि फिर से कोई दिल न टूटे
दुनिया सच्चे प्रेम पर यूँ न रूठे।