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यमुना और पीपल

August 20, 2025

पीपल आज अपने निर्झर संगीत को जीने की कोशिश कर रहा है
शांत स्वर, अशांत मन,
शीतल संध्या, जलता तन।
पीपल अपने पत्तो से बोल रहा
शायद गहरी यमुना की गहराई तोल रहा।।

क्यों इतनी शांत हुई हो आज ?
क्या मिटने का भय है?
मिटना तो भौतिकता का, आज नहीं, नियति से तय है
भाव जियेंगे, भाव चलेंगे
पर नाम नहीं अब चल पाएंगा।
अब होगा संगम तुम्हारा और जल गंगाजल हो जाएगा।।

जल पर पड़ती चंद्र किरणों ने
यमुना की मुस्कान बिखेर दी।
पड़ी चंद्र किरणे जब यमुना पर, तो मुझे पड़ा दिखाई
अभिलाषाएँ जब तृप्त होती है, तब आती है गहराई।।

परिभाषाओँ में ये बातें नहीं जा सकती समझाई
सुनकर पीपल की बातें यमुना केवल मुस्काई।
अंतर्मंन में शायद उनके यही बात थी आई।।

यह पीपल भी, अब मानव सा
ज्ञानी होने का भ्रम शायद पाल रहा है.
नियति को नियति की नीयत समझा रहा।।

पर यमुना तो यम -"उना" है आखिर
तो पीपल को कुछ कैसे कहती।
होती वो भी उच्छल यदि तो
यमुना "यमुना" न रहती।।

जाने कितने पीपल की
पोपले किनारे पर निकली होंगी।
उन्हें मिलन का भाग्य मिला है
इसलिए वो गहरी होंगी।।
पर जो मिलने को तड़प रहे है
उन्हें लगा वो ठहरी होंगी ।।