सजीवों की कतार
निर्जीव पत्थर के सामने
मृत मानवता के चश्मदीत खड़े
अपना भाग्य चमकाने।
दूध गिरा कर जाने क्या शुद्ध कर रहे है
या! किसी की भूखा का साधन अवरूध कर रहे है।
प्रेम की परिभाषा, उनसे सुननी पड़ती है
जिनकी भाषा भी अनजानी है
क्या कह दू ? किससे कह दू ?
अंतर में किसकी कहानी है।
उमड़ते घुमड़ते भावों के बादल
या मन को उलझाते प्रश्नों के दलदल
पूछते है ...
उदास सरोवर के कमल कब खिलेंगे ?
जो बैठा है फुटपाथ पे नंगे बदन
उनको सपनो के महल कब मिलेंगे ?
कब उड़ेंगे हम सपनो से उतर सच के खटोले में ?
कब बरसेगा मन मन के टोले में ?
प्रश्न अनुन्तरित न रहेंगे?
मेरे प्रभु अब कब अवतरित होंगे?