सत्य पर पहरा
August 20, 2025
तन्हाई पर इतना पहरा !
शायद सत्य है कोई गहरा।
अंतर्मंन में तड़प उठी है
पर बातें तो वही रुकीं है।
पथरायें से चछु है ऐसे
वृक्ष भी घिरा दीवारों से जैसे।
दीवारों से घिरा हुआ
पथराया सा खड़ा हुआ।
उसके मौन को बोले पंछी
उसकी बातें इतनी अच्छी।
जड़वत खुद है पर जीवन को गति देता है
बंधा हुआ है स्वयं जड़ो से, पर मुक्ति मार्ग देता है।
खड़ा नहीं होता जो स्थिर, पंछी विश्राम कहा पर लेता?
सबकी गति में जीवन है
पर उसकी जड़ मेंही जीवन की गति है ।
जीवन संगीत मधुर है, पर कुछ कहीं पे ठहरा है
बोले मुझसे या ना बोले, पर दुख तो कोई गहरा है।
जुडी हुई हैं सारी डाले, पर एक निश्चित दूरी है
मिलना चाहे एक-दूजे से, पर प्रकृति प्रदत मजबूरी है।